
हिंदू और जैन धर्म में चातुर्मास यानी चौमास का अत्यंत महत्व है। यह महीना पूर्ण रूप से आहार, आत्म-शुद्धिकरण, पूजा-पाठ, जप-तप, दान और ध्यान को समर्पित है। हिंदू पंचांग के अनुसार, चातुर्मास की शुरुआत आषाढ़ महीने से शुरू होकर कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी पर समाप्त होती है।
चार्तुमास के दौरान वर्षऋतु के प्रभाव के कारण पर्यावरण में हानिकारक बैक्टीरिया की तादाद स्वाभाविक रूप से काफी बढ़ जाती है, जिसके कारण हमारी पाचन शक्ति मंद पड़ जाती है। इस वजह से धार्मिक अनुष्ठान और आध्यात्मिक क्रियाकलापों के साथ-साथ चातुर्मास के दौरान शरीर को स्वस्थ को बेहतर बनाए रखने के लिए शुद्धि-सात्विक भोजन ग्रहण करने के साथ व्रत-उपवास करने पर जोर दिया जाता है।
चातुर्मास क्या है?
हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार, चातुर्मास का मतलब है, चार पवित्र महीने, देवशयनी एकादशी से होकर देवउठनी एकादशी तक का पवित्र समय है।
इन पवित्र महीनों में श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक का महीना शामिल है। इस साल चातुर्मास की शुरुआत 25 जुलाई, 2026, शनिवार से शुरू होकर 20 नवंबर 2026 देवउठनी एकादशी के दिन समाप्त होगी।
चातुर्मास से जुड़ी पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार चातुर्मास के पीछे एक दिलचस्प कथा राजा बलि और भगवान विष्णु के अवतार वामन से जुड़ी है। बताया जाता है कि, जब राजा बलि ने तीनों लोकों पर अपना अधिकार कर लिया, तब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर तीन पग भूमि मांगी।
अपने दो पग में उन्होंने पृथ्वी और स्वर्ग लोक नाप लिया। तीसरे पग के लिए राजा बलि ने अपना सिर उनके चरणों में अर्पित कर दिया। राजा बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्होंने वरदान दिया कि, वे हर साल 4 महीने उन्हीं के लोक में निवास करेंगे।
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चातुर्मास में अन्य देवी-देवताओं की भूमिका
चार महीने के दौरान जब भगवान विष्णु क्षीरसागर में विश्राम के लिए चले जाते हैं, तब पृथ्वी का संचालन अलग-अलग देवी-देवताओं द्वारा किया जाता है।
श्रावण मास में भगवान शिव सृष्टि की बागडोर संभालते हैं।
भाद्रपद मास में भगवान कृष्ण और भगवान श्रीगणेश
आश्विन मास में मां दुर्गा धरती का संचालन करती हैं।
कार्तिक मास मां लक्ष्मी, जबकि पितृपक्ष के दौरान पूर्वज द्वारा पृथ्वी का संचालन किया जाता है। इसी कारण से चातुर्मास के महीने को देवी-देवता की उपासना के लिए अत्यंत पवित्र माना गया है।

चातुर्मास के दौरान क्या करें?
चातुर्मास के दौरान जप-तप, ध्यान और मंत्र का जाप करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
इस दौरान भगवान की भक्ति के साथ उन्हें अधिक से अधिक स्मरण करना चाहिए।
धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करने के साथ उनका अनुसरण करना चाहिए।
सुबह-शाम मंदिर और पूजा घर में दीपदान और ईश्वर की पूजा करनी चाहिए।
चातुर्मास के दौरान दान, पुण्य और सेवा भाव का अत्यंत महत्व होता है।
कुल मिलाकर चातुर्मास के चार महीने हमें भक्ति, संयम, सेवा और आत्म विश्लेषण का मार्ग दिखाते हैं।
चातुर्मास के दौरान सबसे महत्वपूर्ण उत्सव हैं गुरु पूर्णिमा, हिंडोला (झूलन यात्रा), रक्षा बंधन, कृष्ण जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी, जल-झिलनी एकादशी, दशहरा, शरद पूर्णिमा, दिवाली पर्व – जिसमें धन तेरस, काली चौदश, दिवाली, नूतन वर्ष और अन्नकूट – और देव प्रबोधिनी एकादशी शामिल हैं।
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