
भारतीय संस्कृति में माता-पिता को जीवन का आधार और सम्मान का पात्र माना गया है। माता-पिता ने अपने बच्चों के पालन-पोषण और उनके सुख के लिए जीवनभर अनेक त्याग किए हैं। ऐसे में वृद्धावस्था में उनकी सेवा और देखभाल करना केवल पुण्य प्राप्त करने का साधन नहीं, बल्कि हमारी नैतिक जिम्मेदारी और मानवीय कर्तव्य है। माता-पिता की सेवा को लेकर हमारे मन में कैसी भावना होनी चाहिए और क्या इस सेवा पर गर्व या अहंकार करना उचित है, इसी विचार को यह लेख सामने रखता है।
किसी ने पुण्य कमाए और किसी ने उपवास रखा, हमने पुण्य नहीं कमाए, बस मां-बाप को अपने साथ रखा। इससे स्पष्ट होता है कि मां-बाप को अपने साथ या पास रखना व उनकी सेवा करना पुण्य का काम है। यदि हम पूजा-पाठ, व्रत-उपवास या तीर्थाटन न करके मां-बाप की सेवा मात्रा करें तो उसका बड़ा पुण्य हमें मिलता है।

तो क्या हम पुण्य कमाने मात्र के लिए मां-बाप की सेवा करते हैं? यदि मां-बाप की सेवा करने से पुण्य न मिले तो क्या हम उनकी सेवा और देखभाल करना छोड़ देंगे? जब हम लाभ के लिए कोई कार्य करते हैं तो वो एक व्यापार जैसी क्रिया ही होती है। यदि हम पुण्य कमाने के उद्देश्य से माता-पिता की सेवा करते हैं तो वो भी एक व्यापार मात्रा ही माना जाना चाहिए और लाभ अथवा पुण्य-प्राप्ति के उद्देश्य को लेकर की गई सेवा के लिए हम गर्व नहीं कर सकते।
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हमें माता-पिता की सेवा के साथ-साथ अपनी सोच भी बदलनी चाहिए लेकिन जो लोग माता-पिता की उपेक्षा करते हैं अथवा उन्हें कष्ट पहुंचाते हैं उनसे वे लोग कहीं अधिक अच्छे हैं जो पुण्य कमाने के लोभ से ही सही, माता-पिता का ध्यान तो रखते हैं। वास्तव में माता-पिता की देखभाल और सेवा-शुश्रूषा एक कर्त्तव्य है, एक उत्तरदायित्व है जिसका निर्वाह करना अनिवार्य है। ऐसा न करना केवल अनैतिकता ही नहीं अपराध भी है।
जब हम अपने कर्त्तव्यों का भली-भांति पालन करते हैं व अपने उत्तरदायित्वों का ठीक से निर्वहन करते हैं तभी एक अच्छे नागरिक बनते हैं और एक नेक इंसान कहलाते हैं। अब यहां प्रश्न उठता है कि क्या भली-भांति अपने कर्त्तव्यों का पालन करने के लिए अथवा अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने के बदले में आत्मश्लाघा अथवा अहंकार जरूरी है?
माता-पिता अपने बच्चों की खुशियों के लिए क्या कुछ नहीं करते? खुद कष्ट सह लेते हैं पर बच्चों की अच्छी से अच्छी परवरिश करने का प्रयास करते हैं। क्या हमने भी कभी अपनी आवश्यकताओं का गला घोंटकर उनकी जरूरतों को पूरा करने का प्रयास किया है? क्या उनकी इच्छानुसार ही हम उनकी देखभाल कर रहे हैं? यदि हम ऐसा कर रहे हैं तभी हम अपने कर्त्तव्यों का ठीक से पालन कर रहे हैं। माता-पिता बचपन में अपने छोटे बच्चों को जितना प्यार करते हैं यदि वृद्धावस्था में वे उनसे उतना ही प्यार नहीं करते तो यह इस बात का ही प्रमाण है कि उनकी देखभाल में अवश्य ही कोई कमी है।
जब हम किसी से कोई ऋण लेते हैं तो उसको चुकाना और ब्याज समेत चुकाना हमारा दायित्व बनता है। यदि हम ब्याज समेत किसी का ऋण चुका देते हैं तो यह एक व्यावसायिक अनिवार्यता है जिसके अभाव में हम दोषी अथवा अपराधी ही ठहराए जाएंगे। माता-पिता की सेवा भी एक ऋण माना गया है। इस ऋण को चुकाने के संदर्भ में हम जब ये दर्पोक्ति करते है कि हमारे मां-बाप हमारे साथ रहते हैं अथवा हम उन्हें अपने साथ रखते हैं। उनकी सेवा करते हैं तो ये वाक्य ही हमारे खोखलेपन व दंभी चरित्रा को उजागर करने के लिए पर्याप्त है। इसमें अहंकार का भाव साफ झलकता है। हमें चाहिए कि हर हाल में माता-पिता का प्यार प्राप्त करें और ये दंभ न करें कि हम माता-पिता की सेवा करते हैं और औरों से अच्छी तरह करते हैं।
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निष्कर्ष
माता-पिता की सेवा किसी पुरस्कार, पुण्य या प्रशंसा की अपेक्षा से नहीं, बल्कि प्रेम, कृतज्ञता और कर्तव्य-बोध से की जानी चाहिए। उन्होंने हमारे जीवन को संवारने के लिए जो त्याग और समर्पण किया है, उसके सामने हमारी सेवा कोई उपकार नहीं, बल्कि हमारा दायित्व है। इसलिए माता-पिता की देखभाल को अपनी उपलब्धि बताने के बजाय इसे सहज मानवीय जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार करना चाहिए। सच्ची सेवा वही है जिसमें दिखावे, अहंकार और किसी प्रतिफल की अपेक्षा न हो, बल्कि केवल माता-पिता के सुख और सम्मान की भावना हो।
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