Tuesday, August 4, 2026
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देवशयनी एकादशी/Devshayani Ekadashi

देवशयनी एकादशी/Devshayani Ekadashi
देवशयनी एकादशी/Devshayani Ekadashi

देवशयनी एकादशी आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। इसे ‘पद्मा एकादशी’, ‘हरिबोधनी एकादशी’ या ‘देव प्रबोधिनी एकादशी’ के नाम से भी जाना जाता है। इस एकादशी से भगवान विष्णु चार महीने के लिए क्षीर सागर में विश्राम करते हैं, जिस कारण इसे देवशयनी एकादशी कहा जाता है। इस दौरान सृष्टि का संचालन भगवान शिव करते हैं।

सभी एकादशियों में देवशयनी एकादशी का विशेष महत्व है। इसे ‘पद्मा एकादशी’ भी कहते हैं क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु कमल पर विराजमान होते हैं। इसे सर्वश्रेष्ठ एकादशी माना जाता है क्योंकि इसी दिन से चातुर्मास का आरंभ होता है, जो अत्यंत पुण्यदायक काल होता है।

देवशयनी एकादशी की व्रत कथा

प्राचीन काल में एक बहुत प्रतापी राजा ‘इंद्रद्युम्न’ हुए, जो विष्णु भक्त थे। वे अपनी प्रजा का पालन न्यायपूर्वक करते थे, परंतु एक बार वे किसी कारणवश व्रत नहीं रख पाए और उन्हें भयंकर कष्ट झेलने पड़े। वे अत्यंत दुखी होकर अपने राज्य का त्याग कर दिया।

एक दिन वे वन में भ्रमण करते हुए एक ऋषि के आश्रम में पहुंचे और अपनी व्यथा सुनाई। ऋषि ने उन्हें देवशयनी एकादशी का व्रत रखने की विधि बताई और कहा कि इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारे सारे कष्ट दूर हो जाएंगे। राजा ने विधिपूर्वक व्रत का पालन किया और अगले दिन द्वादशी को पारण किया।

व्रत के प्रभाव से राजा के सभी कष्ट दूर हो गए और उन्हें पुनः अपना राज्य प्राप्त हुआ। इस व्रत के पुण्य से राजा विष्णु लोक को प्राप्त हुए। इस प्रकार यह एकादशी सभी कष्टों को दूर करने वाली मानी जाती है।

व्रत विधि

दशमी की रात्रि से ही व्रत की तैयारी शुरू हो जाती है। इस रात सात्विक भोजन करना चाहिए और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। जमिनी पर सोना भी उत्तम माना जाता है।

एकादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं। स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर के समक्ष व्रत का संकल्प लें। भगवान विष्णु की पूजा करें, उन्हें पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करें और तुलसी दल अवश्य चढ़ाएं।

समय करने का कार्य

प्रातःकाल उठकर स्नान करें, स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

सुबह भगवान विष्णु का स्मरण करें और व्रत का संकल्प लें।

दोपहर भगवान विष्णु की षोडशोपचार पूजा करें। तुलसी दल अवश्य अर्पित करें।

संध्याकाल भगवान विष्णु की आरती करें और भजन-कीर्तन करें।

रात्रि फलाहार ग्रहण करें और भगवान का ध्यान करते हुए सोएं।

द्वादशी के दिन, व्रत का पारण शुभ मुहूर्त में किया जाता है। स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान विष्णु की पूजा करें और ब्राह्मणों को भोजन कराएं। इसके पश्चात स्वयं सात्विक भोजन ग्रहण कर व्रत खोलें।

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व्रत में क्या खाएं और क्या नहीं

देवशयनी एकादशी का व्रत रखते समय फलाहार, दूध, दही, पनीर, कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा, साबूदाना और मेवे खाए जा सकते हैं। यह सभी वस्तुएं सात्विक होती हैं और व्रत के नियमों के अनुरूप हैं।

इस व्रत में चावल, दाल, गेहूं, बेसन, लहसुन, प्याज और किसी भी प्रकार का तामसिक भोजन वर्जित है। चावल वर्जित होने का कारण यह है कि ऐसी मान्यता है कि एकादशी के दिन चावल खाना पाप के समान है। लहसुन-प्याज का सेवन भी तामसिक माना जाता है, जो व्रत की पवित्रता को भंग करता है।

देवशयनी एकादशी व्रत के लाभ

पाप-मोचन – इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य के सभी पाप कर्मों का नाश हो जाता है। पुराणों के अनुसार, यह व्रत मनुष्य को नरक की यातनाओं से बचाता है।

मोक्ष प्राप्ति – जो भक्त श्रद्धापूर्वक इस एकादशी का व्रत रखते हैं, उन्हें मृत्यु के उपरांत मोक्ष की प्राप्ति होती है और वे भगवान विष्णु के लोक में स्थान पाते हैं।

सांसारिक लाभ – इस व्रत के पुण्य से मनुष्य को धन, धान्य, सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती है। जीवन की सभी बाधाएं दूर होती हैं और सौभाग्य में वृद्धि होती है।

स्वास्थ्य लाभ – उपवास रखने से शरीर की पाचन क्रिया सुधरती है और विषैले तत्व बाहर निकलते हैं। यह शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभदायक है।

देवशयनी एकादशी/Devshayani Ekadashi

देवशयनी एकादशी से चार मास महादेव करते हैं सृष्टि का संचालन

देवशयनी एकादशी को भगवान विष्णु चार माह के लिए योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं। इस अवधि में महादेव सृष्टि का संचालन करते हैं और उनकी आराधना करने वाले व्यक्ति को विष्णु पूजा का भी फल मिलता है। शास्त्रों में वर्णित है कि योग निद्रा एक दिव्य, ऊर्जात्मक विश्राम है, जिसमें भगवान नारायण सृष्टि संचालन से कुछ समय के लिए विराम लेते हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं, तब ब्रह्मांड के संचालन का कार्य कौन करता है, इस संदर्भ में मान्यता है कि भगवान शिव इस कालखंड में ब्रह्मांड के संचालन का दायित्व संभालते हैं। अतः इस अवधि में जो व्यक्ति भगवान शिव की आराधना करता है, उसे विष्णु पूजा का भी फल प्राप्त होता है, यही सनातन धर्म की दिव्यता है।

प्राचीन काल के वैज्ञानिकों को ऋषि-महर्षि की उपाधि दी गई है, जिनके शोध कार्य ग्रंथों के रूप में आज भी जनमानस को स्वास्थ्य लाभ, कार्यों में सफलता और मृत्यु उपरान्त मोक्ष का मार्ग प्रशस्त कर मानव जीवन को सुखी और संपन्न बना रहे हैं। देवशयनी एकादशी से चार मास तक महादेव सृष्टि का संचालन करते हैं। इस समय को साधना, तप और संयम का काल माना गया है। श्रावण मास में शिव की उपासना का विशेष महत्व इसी कारण से है, क्योंकि यही वह काल होता है जब शिव ही संपूर्ण ब्रह्मांड का संचालन कर रहे होते हैं। यह समय हमारे भीतर के विष्णु अर्थात् संरक्षण शक्ति के विश्राम का और भीतर के शिव अर्थात् परिवर्तन व त्याग शक्ति के जागरण का होता है। अतः चातुर्मास केवल धार्मिक अनुष्ठानों का समय नहीं, बल्कि आत्मसंयम, साधना और आध्यात्मिक उन्नयन का एक श्रेष्ठ अवसर है।

इन चार मासों में, जिसे चातुर्मास कहकर संबोधित किया जाता है, शुभ कार्य जैसे विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश आदि नहीं किए जाते हैं, क्योंकि भगवान विष्णु विश्रामरत होते हैं और ब्रह्मांड की ऊर्जा अधिकतर साधना और आत्मशुद्धि की ओर केंद्रित रहती है। संत महात्मा, तपस्वी और गृहस्थ इस काल में व्रत, उपवास, जप और ध्यान के माध्यम से आत्मिक उन्नति करते हैं। आयुर्वेद भी इस समय को शरीर की विषैले तत्वों को बाहर निकालने का श्रेष्ठ समय मानता है।

चातुर्मास का यह काल जीवन में संतुलन, संयम और समर्पण की भावना विकसित करता है। भगवान शिव, जो परिवर्तन और विनाश के अधिपति हैं, इस काल में सृष्टि को न केवल संवारते हैं, बल्कि जीवात्माओं को भीतर से मजबूत करने के लिए उन्हें साधना का अवसर प्रदान करते हैं। मान्यताओं के अनुसार देवशयनी एकादशी से चार मास पर्यन्त विष्णु विश्राम करते हैं और शिव, जाग्रत होकर सृष्टि संचालन का भार उठाते हैं।

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देवशयनी एकादशी 2026 पर भूल से भी न करें ये काम

देवशयनी एकादशी 2026 के शुभ अवसर पर जातक को बाल नहीं धोने चाहिए और न  ही कटवाने चाहिए। साथ ही, नाखून भी नहीं काटने चाहिए। ऐसी मान्यता है कि इस दिन बाल और नाख़ून कटवाना अशुभ माना जाता है।

देवशयनी एकादशी पर गलती से भी काले रंग के वस्त्र नहीं पहनने चाहिए क्योंकि काले रंग को अशुभ माना गया है। यह एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित होती है और उनका प्रिय रंग पीला है इसलिए एकादशी तिथि पर पीले रंग के कपड़े पहनना अत्यंत शुभ होता है।

किसी भी एकादशी पर चावल या चावल से बनी हुई चीज़ों का सेवन नहीं करना चाहिए। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, चावल में जल की मात्रा काफी ज्यादा होती है और जल पर चंद्रमा का प्रभाव होता है इसलिए इस दिन चावल के सेवन से परहेज़ करना चाहिए।

देवशयनी एकादशी 2026 के शुभ अवसर पर तामसिक भोजन जैसे लहसुन, प्याज और मांसाहार आदि का गलती से भी सेवन नहीं करना चाहिए और न ही घर पर बनने देना चाहिए।

देवशयनी एकादशी का व्रत करने वाले जातक को इस दिन ​जमीन पर बिस्तर लगाना चाहिए और उसी पर लेटना चाहिए। इस तिथि पर पूर्ण रात्रि सोना नहीं चाहिए, बल्कि रात भर भगवान का स्मरण और भजन करना चाहिए।

इस दिन व्यक्ति को झूठ बोलने से बचना चाहिए और सदैव सत्य बोलना चाहिए। साथ ही, मन में पवित्र विचार बनाए रखने का प्रयास करें।

देवशयनी एकादशी व्रत के दौरान जातक को तन और मन को शुद्ध रखना चाहिए। साथ ही, इस दिन मन में किसी भी तरह के बुरे विचार लेकर आने से बचना चाहिए और न ही किसी से अपशब्द कहें।

इस व्रत में व्यक्ति को पूर्ण रूप से ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।

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— सारिका असाटी

 

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