Tuesday, August 4, 2026
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जगन्नाथ रथ यात्रा का महत्व/Significance of the Jagannath Rath Yatra

जगन्नाथ रथ यात्रा का महत्व/Significance of the Jagannath Rath Yatra
जगन्नाथ रथ यात्रा का महत्व/Significance of the Jagannath Rath Yatra

उड़ीसा के प्रसिद्ध तीर्थस्‍थान पुरी में हर साल भगवान जगन्‍नाथ की रथ यात्रा निकाली जाती है। पंचांग के अनुसार हर साल आषाढ़ मास के शुक्‍ल पक्ष की द्वितीया को इस विश्‍व प्रसिद्ध रथयात्रा का आयोजन होता है। भगवान जगन्‍नाथ अपने भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ नगर भ्रमण करते हुए अपनी मौसी के घर गुंडिचा मंदिर की ओर प्रस्‍थान करेंगे।

मूर्ति में नहीं हैं किसी के हाथ-पैर और पंजे

सुनने में यह बात अजीब जरूर लगती है, लेकिन यह सच है कि भगवान जगन्‍नाथ, बहन सुभद्रा और बड़े भाई बलराम जी तीनों की मूर्तियों में किसी के हाथ, पैर और पंजे नहीं होते हैं। इसके पीछे भी एक पौराणिक कथा यह है कि प्राचीन काल में इन मूर्तियों को बनाने का काम विश्‍वकर्मा जी कर रहे थे। उनकी यह शर्त थी कि जब तक मूर्तियों को बनाने का काम पूरा नहीं हो जाएगा, तब तक उनके कक्ष में कोई भी प्रवेश नहीं करेगा। लेकिन राजा ने उनके कक्ष का दरवाजा खोल दिया तो विश्‍वकर्माजी ने मूर्तियों को बनाना बीच में ही छोड़ दिया। तब से मूर्तियां अधूरी रह गईं जो कि आज तक पूरी नहीं हो पाई हैं। तब से इन तीनों मूर्तियों के हाथ पैर और पंजे नहीं होते। मूर्तियों को नीम की लकड़ी से बनाया जाता है।

ऐसे होते हैं रथ

भगवान जगन्‍नाथ की यात्रा के रथ भी बेहद खास होते हैं। इन्‍हें नीम के पेड़ की लड़की से बनाया जाता है। रथ यात्रा की तैयारी हर साल बसंतपंचमी से शुरू हो जाती है। खास बात यह होती है कि इसको बनाने में किसी भी प्रकार की धातु का कतई प्रयोग नहीं होता है। रथ की लकड़ी प्राप्‍त करने के लिए स्‍वस्‍थ और शुभ पेड़ की पहचान की जाती है।

ऐसा होता है जगन्‍नाथजी का रथ

जगन्‍नाथ जी का रथ 16 पहियों का बना होता है और इसमें लकड़ी के 332 टुकड़ों का प्रयोग किया जाता है और इसकी ऊंचाई 45 फीट होती है। भगवान जगन्‍नाथ के रथ का रंग लाल और पीला होता है। रथ का निर्माण कार्य अक्षय तृतीया के दिन से आरंभ हो जाता है। उनका रथ बाकी दो रथों से आकार में बड़ा होता है। इनके रथ पर हनुमानजी और नृसिंह भगवान का प्रतीक अंकित रहता है और यह रथ यात्रा में सबसे पीछे रहता है।

बलरामजी के रथ की खास बात

बलरामजी भगवान जगन्‍नाथजी के बड़े भाई हैं और बड़े होने के नाते यह सबका नेतृत्‍व करते हैं। इसलिए यात्रा में इनका रथ सबसे आगे रहता है। इनके रथ की ऊंचाई 44 फुट होती है। इस रथ में नीले रंग का प्रयोग प्रमुखता से किया जाता है।

बहन सुभद्रा का रथ

कृष्‍ण और बलराम की लाडली बहन सुभद्रा का रथ दोनों भाइयों के सुरक्षा घेरे में रहता है। यानी सुभद्रा का रथ दोनों रथों के बीच में चलता है। इसकी ऊंचाई 43 फीट होती है और इसको सजाने में मुख्‍य रूप से काले रंग का प्रयोग किया जाता है।

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जगन्नाथ रथ यात्रा का महत्व/Significance of the Jagannath Rath Yatra

मूर्तियों में भी अस्थियां

पुराणों में बताया गया है कि इन मूर्तियों का निर्माण राजा नरेश इंद्रद्युम्‍न ने करवाया था। वह भगवान विष्‍णु के परम भक्‍त थे। मान्‍यता है कि राजा के सपने में आकर भगवान ने उन्‍हें मूर्तियों को बनाने का आदेश दिया था। सपने में उन्‍हें बताया गया है कि श्रीकृष्‍ण नदी में समा गए हैं और उनके विलाप में बलराम और सुभद्रा भी नदी में समा गए हैं। उनके शवों की अस्थियां नदी में पड़ी हुई हैं। भगवान के आदेश को मानकर राजा ने तीनों की अस्थियां नदी से बटोरीं और मूर्तियों के निर्माण के वक्‍त प्रत्‍येक मूर्ति में थोड़ा-थोड़ा अंश रख दिया। जगन्‍नाथजी के मंदिर का निर्माण करीब 1000 साल पहले हुआ था और तब से हर 14 साल में यहां प्रतिमाएं बदल दी जाती हैं।

रथ खींचने से मिलता है यह पुण्‍य

यात्रा के बारे में ऐसी मान्यता है कि जो भी भगवान जगन्नाथ के रथ को खींचता है उसे फिर जन्म नहीं लेना पड़ता है यानी उसे इसी जन्म में मुक्ति मिल जाती है। इसलिए रथ को खींचने के लिए लोगों में गजब का उत्साह रहता है।

यहां हवा की दिशा तक बदल जाती है

भगवान जगन्नाथ को समर्पित इस मंदिर का निर्माण 10 वीं शताब्दी में हुआ था, जिसे चार धामों में भी स्थान प्राप्त है। ऐसी मान्यता है कि मंदिर की चोटी पर लहराता ध्वज सदैव हवा के विपरीत दिशा में लहराता है। दरअसल ऐसा कहा जाता है कि यहां दिन के समय हवा समुद्र से जमीन की तरफ आती है और शाम में इसके उलट दिशा में हवा बहती है। मगर मंदिर का ध्वज इसके ठीक विपरीत उल्टे दिशा में लहराता है, क्योंकि मंदिर में हवा दिन में समुद्र की ओर और रात में मंदिर की तरफ बहती है।

हर दिन बदला जाता है ध्‍वज

भारत में किसी मंदिर का ध्वज हर दिन नहीं बदला जाता है। जगन्नाथजी का मंदिर ही एक मात्र मंदिर है जिसका ध्वज हर दिन बदला जाता है। हर दिन एक पुजारी को ऊंचे गुंबद पर चढ़कर ध्वज बदलना होता है। जगन्नाथ मंदिर की ऐसी मान्यता है कि अगर एक दिन भी ध्वज नहीं बदला गया तो मंदिर 18 वर्षों के लिए बंद हो जाएगा।

ऐसी भी है मान्‍यता

रहस्‍यों से भरे इस मंदिर के बारे में यह भी कहा जाता है कि इस मंदिर के ऊपर कभी भी कोई पक्षी उड़ता हुआ नहीं दिखता। यहां तक कि कोई विमान भी इसके ऊपर से होकर नहीं गुजर सकता। माना जाता है कि यहां एक विशेष प्रकार की चुम्‍बकीय शक्ति के कारण ऐसा होता है।

जगन्नाथ रथ यात्रा का महत्व

हिन्दू धर्म में जगन्नाथ रथ यात्रा का एक बहुत बड़ा महत्व हैं। मान्यताओं के अनुसार रथ यात्रा को निकालकर भगवान जगन्नाथ को प्रसिद्ध गुंडिचा माता मंदिर पहुंचाया जाता हैं। यहां भगवान जगन्नाथ आराम करते हैं।

गुंडिचा माता मंदिर में भारी तैयारियां की जाती हैं और मंदिर की सफाई के लिये इंद्रद्युमन सरोवर से जल लाया जाता हैं। यात्रा का सबसे बड़ा महत्व यही है कि यह पूरे भारत में एक पर्व की तरह मनाया जाता हैं। चार धाम में से एक धाम जगन्नाथ मंदिर को माना गया हैं। इसलिए जीवन में एक बार इस यात्रा में शामिल होने का शास्त्रों में भी उल्लेख हैं।

जगन्नाथ रथयात्रा में सबसे आगे भगवान बलभद्र का रथ रहता हैं बीच में भगवान की बहन सुभद्रा का और उसके पीछे भगवान जगन्नाथ का रथ रहता हैं। इस यात्रा में जो भी सच्चे भाव से शामिल होता हैं उसकी मनोकामना पूर्ण होकर उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

यात्रा में शामिल होने वाले को मिलता हैं यज्ञ बराबर पुण्य

भगवान जगन्नाथ को श्रीकृष्ण का अवतार माना गया हैं। जिनकी महिमा का उल्लेख धार्मिक ग्रंथों और पुराणों में भी किया गया हैं। ऐसी मान्यता हैं कि जगन्नाथ रथयात्रा में भगवान श्रीकृष्ण और उनके भाई बलराम और बहन सुभद्रा का रथ होता हैं। जो इस रथयात्रा में शामिल होकर रथ को खींचते हैं उन्हें सौ यज्ञ के बराबर पुण्य लाभ मिलता हैं।

रथयात्रा के दौरान लाखों की संख्या में लोग शामिल होते हैं और रथ को खींचने के लिए श्रद्धालुओं का भारी तांता लगता हैं। जगन्नाथ रथयात्रा का इतिहास

भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा देश में एक पर्व की तरह मनाई जाती है, इसलिए पुरी के अलावा कई जगह यह यात्रा निकाली जाती हैं। रथयात्रा को लेकर कई तरह की मान्यताएं और इतिहास हैं। बताया जाता हैं कि एक दिन भगवान जगन्नाथ की बहन सुभद्रा ने नगर देखने की चाह रखते हुए भगवान से द्वारका के दर्शन कराने की प्रार्थना की तब भगवान जगन्नाथ ने अपनी बहन को रथ में बैठाकर नगर का भ्रमण करवाया। जिसके बाद से यहां हर वर्ष जगन्नाथ रथयात्रा निकाली जाती हैं। इस यात्रा में भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलराम और बहन सुभद्रा की प्रतिमाएं रखी जाती हैं और उन्हें नगर का भ्रमण करवाया जाता हैं।

यात्रा के तीनों रथ लकड़ी के बने होते हैं जिन्हें श्रद्धालु खींचकर चलते हैं। भगवान जगन्नाथ के रथ में 16 पहिए लगे होते हैं एवं भाई बलराम के रथ में 14 व बहन सुभद्रा के रथ में 12 पहिए लगे होते हैं। यात्रा का वर्णन स्कंद पुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण, बह्म पुराण आदि में मिलता हैं। इसीलिए यह यात्रा हिन्दू धर्म में काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है।

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जगन्नाथ रथ यात्रा का महत्व/Significance of the Jagannath Rath Yatra

भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा से जुड़ी कुछ खास और रोचक बातें…

  • पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर भारत के चार पवित्र धामों में से एक है। वर्त्तमान मंदिर 800 वर्ष से अधिक प्राचीन है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण, जगन्नाथ रूप में विराजित है। साथ ही यहां उनके बड़े भाई बलराम (बलभद्र या बलदेव) और उनकी बहन देवी सुभद्रा की पूजा की जाती है।
  • पुरी रथयात्रा के लिए बलराम, श्रीकृष्ण और देवी सुभद्रा के लिए तीन अलग-अलग रथ निर्मित किए जाते हैं। रथयात्रा में सबसे आगे बलरामजी का रथ, उसके बाद बीच में देवी सुभद्रा का रथ और सबसे पीछे भगवान जगन्नाथ श्रीकृष्ण का रथ होता है। इसे उनके रंग और ऊंचाई से पहचाना जाता है।
  • बलरामजी के रथ को ‘तालध्वज’ कहते हैं, जिसका रंग लाल और हरा होता है। देवी सुभद्रा के रथ को ‘दर्पदलन’ या ‘पद्म रथ’ कहा जाता है, जो काले या नीले और लाल रंग का होता है, जबकि भगवान जगन्नाथ के रथ को ‘ नंदीघोष’ या ‘गरुड़ध्वज’ कहते हैं। इसका रंग लाल और पीला होता है।
  • भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष रथ 45.6 फीट ऊंचा, बलरामजी का तालध्वज रथ 45 फीट ऊंचा और देवी सुभद्रा का दर्पदलन रथ 44.6 फीट ऊंचा होता है।
  • सभी रथ नीम की पवित्र और परिपक्व काष्ठ (लकड़ियों) से बनाए जाते हैं, जिसे ‘दारु’ कहते हैं। इसके लिए नीम के स्वस्थ और शुभ पेड़ की पहचान की जाती है, जिसके लिए जगन्नाथ मंदिर एक खास समिति का गठन करती है।
  • इन रथों के निर्माण में किसी भी प्रकार के कील या कांटे या अन्य किसी धातु का प्रयोग नहीं होता है। रथों के लिए काष्ठ का चयन बसंत पंचमी के दिन से शुरू होता है और उनका निर्माण अक्षय तृतीया से प्रारम्भ होता है।
  • जब तीनों रथ तैयार हो जाते हैं, तब ‘छर पहनरा’ नामक अनुष्ठान संपन्न किया जाता है। इसके तहत पुरी के गजपति राजा पालकी में यहां आते हैं और इन तीनों रथों की विधिवत पूजा करते हैं और ‘सोने की झाड़ू’ से रथ मण्डप और रास्ते को साफ़ करते हैं।
  • आषाढ़ माह की शुक्लपक्ष की द्वितीया तिथि को रथयात्रा आरम्भ होती है। ढोल, नगाड़ों, तुरही और शंखध्वनि के बीच भक्तगण इन रथों को खींचते हैं। कहते हैं, जिन्हें रथ को खींचने का अवसर प्राप्त होता है, वह महाभाग्यवान माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, रथ खींचने वाले को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
  • जगन्नाथ मंदिर से रथयात्रा शुरू होकर पुरी नगर से गुजरते हुए ये रथ गुंडीचा मंदिर पहुंचते हैं। यहां भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा सात दिनों के लिए विश्राम करते हैं। गुंडीचा मंदिर में भगवान जगन्नाथ के दर्शन को ‘आड़प-दर्शन’ कहा जाता है।
  • गुंडीचा मंदिर को ‘गुंडीचा बाड़ी’ भी कहते हैं। यह भगवान की मौसी का घर है। इस मंदिर के बारे में पौराणिक मान्यता है कि यहीं पर देवशिल्पी विश्वकर्मा ने भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी की प्रतिमाओं का निर्माण किया था।
  • कहते हैं कि रथयात्रा के तीसरे दिन यानी पंचमी तिथि को देवी लक्ष्मी, भगवान जगन्नाथ को ढूंढते हुए यहां आती हैं। तब द्वैतापति दरवाज़ा बंद कर देते हैं, जिससे देवी लक्ष्मी रुष्ट होकर रथ का पहिया तोड़ देती है और ‘हेरा गोहिरी साही पुरी’ नामक एक मुहल्ले में, जहां देवी लक्ष्मी का मंदिर है, वहां लौट जाती हैं।
  • बाद में भगवान जगन्नाथ द्वारा रुष्ट देवी लक्ष्मी मनाने की परंपरा भी है। यह मान-मनौवल संवादों के माध्यम से आयोजित किया जाता है, जो एक अद्भुत भक्ति रस उत्पन्न करती है।
  • आषाढ़ माह के दसवें दिन सभी रथ पुन: मुख्य मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। रथों की वापसी की इस यात्रा की रस्म को बहुड़ा यात्रा कहते हैं।
  • जगन्नाथ मंदिर वापस पहुंचने के बाद भी सभी प्रतिमाएं रथ में ही रहती हैं। देवी-देवताओं के लिए मंदिर के द्वार अगले दिन एकादशी को खोले जाते हैं, तब विधिवत स्नान करवा कर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच देव विग्रहों को पुनः प्रतिष्ठित किया जाता है।
  • वास्तव में रथयात्रा एक सामुदायिक आनुष्ठानिक पर्व है। इस अवसर पर घरों में कोई भी पूजा नहीं होती है और न ही किसी प्रकार का उपवास रखा जाता है। एक अहम् बात यह कि रथयात्रा के दौरान यहां किसी प्रकार का जातिभेद देखने को नहीं मिलता है।

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रथयात्रा में शमिल होने की महिमा…

रथयात्रा एक ऐसा पर्व है जिसमें भगवान जगन्नाथ चलकर अपने भक्‍तों के बीच आते हैं और उनके दु:ख-सु:ख में सहभागी होते हैं। इसका महत्‍व शास्त्रों और पुराणों में भी बताया गया है। स्‍कंद पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि जो भी व्‍यक्ति रथयात्रा में शामिल होकर गुंडीचा नगर तक जाता है।

वह जीवन-मरण के चक्र से मुक्‍त हो जाता है। वहीं जो भक्‍त श्रीजगन्नाथजी का दर्शन करते हुए, प्रणाम करते हुए मार्ग के धूल-कीचड़ से होते हुए जाते हैं वे सीधे भगवान श्रीविष्णु के उत्तम धाम को जाते हैं। इसके अलावा जो गुंडिचा मंडप में रथ पर विराजमान श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा देवी के दक्षिण दिशा को आते हुए दर्शन करते हैं वे मोक्ष को प्राप्त होते हैं।

यह लेख सामान्य जानकारी पर आधारित है। लेख पसंद आए तो इसे ज़्यादा से ज़्यादा शेयर करें। अपने विचार और सुझाव कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें।

 

– सारिका असाटी

 

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