
‘गया‘ बिहार राज्य में स्थित एक प्राचीन व पौराणिक तीर्थ स्थल है। सुर-सरिता गंगा नदी के तट पर स्थित यह तीर्थ पितरों के लिए तर्पण व मृत आत्माओं की शांति के लिए विख्यात है। गया तीर्थ में मृतकों की आत्मशांति के लिए पिंडदान का विशेष महत्त्व है। शास्त्रों में कहा गया है-
‘प्रयाग मुंडे गया पिंडे….’
अर्थात् प्रयागराज (इलाहाबाद) में मुंडन करना व गया जी में पितरों के लिए पिंडदान करने का विशेष महत्त्व है। भगवान विष्णु प्राणी मात्रा को मुक्ति देने के लिए ‘गदाध‘ के रूप में गया में निवास करते हैं।
ग्यासुर की विशुद्ध देह में ब्रह्माजी, जनार्दन शिव तथा प्रपितामह स्थित हैं। भगवान विष्णु ने यहां की मर्यादा स्थापित करते हुए कहा कि इसकी देह पुण्य क्षेत्रा के रूप में हो गई। यहां जो भक्ति, यज्ञ, श्राद्ध, पिंडदान तथा स्थानानादि करेगा, वह भव बंधन से मुक्त होकर स्वर्गलोक व ब्रह्मलोक में जाएगा।

कर्म पुराण के चौंतीसवें अध्याय में गया तीर्थ की महिमा का वर्णन करते हुए लिखा है कि गया नामक परम तीर्थ पितरों को अत्यंत प्रिय है। जो मनुष्य एक बार भी गया जाकर पिंडदान करता है, उसके द्वारा तारे गए पितर परम गति को प्राप्त करते हैं।
गया क्षेत्रा में ऐसा कोई स्थान नहीं जहां पर तीर्थ नहीं हैं। पांच कोस के क्षेत्रा में स्थित गया में कहीं भी पिंडदान कराने वाला व्यक्ति स्वयं अक्षय फल प्राप्तकर पितृगणों को ब्रह्मलोक पहुंचाने का अधिकारी बनता है।
गयायां न हि तत्स्थानं यत्रा तीर्थ न विधते।
पंचकोशे गया क्षेत्रो यत्रा तत्रा तु पिंडद।
जो व्यक्ति गया तीर्थ जाकर वहां रात्रिवास करते हैं, उनके सात कुलों का उद्धार हो जाता है। गया में मुंडपृष्ठ, अरविंद पर्वत तथा क्रोंचपाद नामक तीर्थों के दर्शन करके व्यक्ति समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। मकर संक्रांति, चन्द्रग्रहण तथा सूर्यग्रहण के अवसर पर गया जाकर पिंडदान करना तीनों लोकों में दुर्लभ है।

पितरों के प्रति समर्पण के परिचायक श्राद्ध
सभ्य समाज में वंशानुगत परंपराओं का निर्वहन करते हुए आगत पीढ़ी को पूर्वजों के इतिहास से परिचित कराना अनिवार्य होता है, ताकि आगत पीढ़ी पारिवारिक मर्यादाओं में रहकर अपने पूर्वजों के यश का विस्तार कर सके। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में प्रथमा से लेकर अमावस्या तक का पखवाड़ा श्राद्ध पक्ष कहलाता है। इससे पूर्व भाद्रपद की पूर्णिमा को प्रथम श्राद्ध के रूप में उन पुण्य आत्माओं का स्मरण किया जाता है, जिन्होंने पूर्णिमा के दिन नश्वर शरीर से प्रयाण किया हो। सनातन मान्यताओं में श्राद्ध पक्ष में सनातन धर्म के अनुयायी अपने मृत पूर्वजों का स्मरण करते हैं तथा उनकी स्मृति में उनकी पसंद का स्मरण करते हुए वही भोज्य पदार्थ बनाते हैं, जो मृतक की प्रिय लगते थे। बहरहाल तर्क शास्त्री भले ही श्राद्ध को तर्क की कसौटी पर खरा न स्वीकारते हों, लेकिन यह विशुद्ध आस्था एवं श्रद्धा का विषय है और धर्म के प्रति आस्था पर प्रश्न चिन्ह नही लगाया जाता।
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श्राद्ध पक्ष में शुभ और अशुभ का विचार अधिक होता है। कुछ परिवारों में श्राद्ध पक्ष में कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता। यहाँ तक कि नई वस्तुओं की खरीदारी से भी परहेज किया जाता है। इस धारणा के पीछे कोई सटीक तर्क नहीं है, कि ऐसा परहेज़ क्यों करना चाहिए। मेरा मत है कि भारत में धर्मानुसार आस्था पर उंगली उठाने का कोई औचित्य नहीं है। इतना अवश्य है कि आधुनिक समाज में समयानुसार हो रहे परिवर्तन के साथ सामंजस्य स्थापित करना अनिवार्य है। यूँ तो तार्किक समाज में श्राद्ध पर ही प्रश्न चिन्ह खड़े करने का चलन शुरू हो गया है तथा खंडित होते परिवारों में स्वार्थ सर्वोपरि हैं। संयुक्त परिवार की अवधारणा लगभग समाप्त हो चुका है।
ऐसे में श्राद्ध मन से कम और औपचारिकता से अधिक मनाए जाने की स्थिति उत्पन्न हो गई है। वैसे भी सामाजिक बदलाव के दौर में व्यक्ति सुविधानुसार आचरण करने हेतु स्वतंत्र है। श्राद्ध पक्ष को यदि आस्था और श्रद्धा से न भी जोड़ा जाए तो श्राद्ध के औचित्य को इस प्रकार समझा जा सकता है, कि वंशानुगत परिचय से आज की पीढ़ी वंचित है। उसकी स्मृतियों में अपने पूर्वजों के नाम तक सुरक्षित नहीं हैं। पिता, दादा से ऊपर की पीढ़ी से आज की पीढ़ी अनभिज्ञ है। ऐसे में यदि सभ्य समाज आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में अपने पूर्वजों के मृत्यु दिवस को स्मरण करता है तथा उनकी स्मृति में भोजन, वस्त्र या अन्य वस्तुएँ अपनी श्रद्धा व सामर्थ्य के अनुसार दान करता है, तो इसे ग़लत कैसे कहा जा सकता है। हाँ इतना अवश्य है कि दान ऐसे सुपात्र को देना चाहिए, जो वास्तव में दीन हीन हो तथा अपने भरण पोषण की व्यवस्था करने में असमर्थ हो।
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श्राद्ध दिवस पर अपने परिवार की उस पुण्यात्मा की चारित्रिक विशेषता से पूरे परिवार को अवगत कराना चाहिए, जिसकी स्मृति में श्राद्ध का आयोजन किया जा रहा है। कहने का आशय यह है कि भले ही हम अपनी पुरातन परंपराओं को तर्क की कसौटी पर खरा न पाएँ, मगर श्राद्ध मनाने के पीछे पूर्वजों के प्रति श्रद्धापूर्ण स्मरण की भावना को नकारा नही जा सकता।
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