
व्रत रखने वाले व्रती दो कारणों से उपवास करते हैं। प्रथम है धार्मिक एवं द्वितीय है स्वास्थ्य लाभ। उपवास रखने वाला व्यक्ति यदि कुछ बातों ध्यान रखें तो उसे और अधिक शारीरिक लाभ मिल सकता है किंतु बीमार व्यक्ति के लिए उपवास खतरनाक सिद्ध हो सकता है।
व्रत:- उपवास रखने से अनेक लाभ हैं। मौसम परिवर्तन की अवस्था में उपवास रखने पर ऋतु संक्रमण काल की बीमारियां पास नहीं आती। मौसमी बीमारियों का आक्रमण नहीं होता। मनुष्य में भूखे रहने एवं भूख सहने की इच्छा शक्ति बढ़ाती है।
बीमारी की अवस्था में
अल्सर, पीलिया, अनीमिया, उल्टी-दस्त, बी. पी., शुगर और हृदय रोग संबंधी बीमारियों में खाली पेट नहीं रहना चाहिए। ऐसी स्थिति में रोगी की तकलीफ बढ़ सकती है। कभी-कभी जान का खतरा भी बना रहता है। अल्सर में खाली पेट रहने पर एसिडिटी बढ़ जाती है। अधिक दिनों तक भूखे रहने पर पेट का अल्सर फटने एवं उसमें से खून निकलने की आशंका रहती है।
पीलिया पीडि़त को भी उपवास नहीं रखना चाहिए। खाना नहीं खाने से शरीर में खून की कमी हो जाती है। इससे कमजोरी एवं चक्कर आने की शिकायत होती है। अनीमिया पेशेंट के लिए उपवास नुकसानदायक है। उन्हें हमेशा कुछ न कुछ खाना चाहिए। ऐसा नहीं करने पर बीमारी बढ़ जाती है।
उल्टी दस्त की स्थिति में खाली पेट नहीं रहना चाहिए। इससे शरीर में पानी की कमी हो जाती है। इस स्थिति में रोगी यदि उपवास रखता है तो शरीर में और पानी की कमी हो जाएगी।
शुगर के रोगी अगर खाली पेट रहते है तो बीमारी और घट-बढ़ सकती है। गर्भवती स्त्री को उपवास से परहेज करना चाहिए। ऐसे समय में उन्हें अतिरिक्त विटामिन, प्रोटीन और कैल्शियम की आवश्यकता होती है। अगर वे उपवास रखती हैं तो बच्चे को पोषक तत्व नहीं मिलेंगे।
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उपवास से लाभ
दोनों नवरात्रियां ऋतु संक्रमण काल में आती हैं। इन दिनों उपवास रखने पर वातावरण के सक्रिय कीटाणु शरीर पर आक्रमण नहीं कर पाते हैं। खाने में नियंत्राण कर बीमारी से दूर रहा जा सकता है।
निर्जला उपवास
निर्जला उपवास से पेट एवं लिवर संबंधित परेशानियां बढ़ जाती हैं। आहार नली में सिकुड़न आ सकती है। बीच-बीच में तरल पदार्थ लेते रहने चाहिए। इससे शरीर में पानी की मात्रा बनी रहती है। चौबीस घण्टे, में एक बार फलाहार या भोजन करने से शारीरिक क्षमता बनी रहती है।
बच्चे, बूढ़े उपवास से सावधान:- 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चे एवं 60 से अधिक आयु के वृद्ध को उपवास नहीं रखना चाहिए। 14 वर्ष तक बच्चों का शारीरिक विकास तेजी से होता है। इस बीच पर्याप्त भोजन एवं पौष्टिक तत्व मिलते रहने से शारीरिक विकास अच्छा होता है। इसी तरह 60 वर्ष की उम्र के बाद रोग प्रतिरोधक क्षमता की कमी होने लगती है जिसे खानपान में ध्यान रख नियंत्रित रखा जा सकता है।

उपवास के बाद खान-पान का रखें ध्यान
उपवास तोड़ने पर सबसे पहले नमक व शक्कर मिला नींबू पानी पीना चाहिए। उपवास तोड़ने पर एक बारगी पूड़ी व मसाले वाली सब्जी अधिक नहीं खाने चाहिए। इसे प्रसाद के तौर पर कुछ मात्रा में लेना चाहिए। व्रत खोलने के बाद नमक वाला सादा खाना जैसे दाल, चावल, सब्जी को आहार में शामिल करना चाहिए।
नवरात्रि उपरान्त एक हफ्ते भर सादा भोजन लेना सेहत के लिए अच्छा रहता है। उपवास की अवस्था में पाचन तंत्र अनियंत्रित हो जाता है जो व्रत सामान्य होने पर एक बारगी अधिक भोजन तेल, घी, मसाला खाने से एसिडिटी, पेट में जलन, दर्द, उल्टी जैसी समस्या पैदा कर सकता है।
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