
श्रावण पुत्रदा एकादशी पर क्यों रखा जाता है व्रत? जानें धार्मिक महत्व
भगवान श्रीहरि विष्णु की कृपा और संतान सुख की कामना के लिए रखा जाने वाला श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत इस वर्ष 23 अगस्त 2026 को रखा जाएगा। वैष्णव परंपरा में इसे ‘पवित्रोपना एकादशी’ या ‘पवित्र एकादशी’ के नाम से भी जाना जाता है। इसका पारण 24 अगस्त को होगा। चलिए जानते हैं इस व्रत का महत्व और कथा।
श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत का महत्व
हिन्दू धर्म में श्रावण पुत्रदा एकादशी का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है।
संतान सुख की प्राप्ति: मान्यता है कि जो नि:संतान दंपति पूरी निष्ठा व विधि-विधान से यह व्रत रखते हैं, उन्हें योग्य संतान की प्राप्ति होती है।पापमुक्ति एवं मोक्ष: इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति के समस्त पूर्वकृत पाप नष्ट हो जाते हैं।
सद्गति: जीवन के पश्चात जीव को मोक्ष और स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है।
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श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत की पौराणिक कथा
भद्रावती नगरी में सुकेतुमान नाम के एक राजा अपनी रानी शैव्या के साथ राज्य करते थे। सब कुछ होते हुए भी संतान न होने के कारण दोनों सदैव गहरी चिंता में रहते थे। राजा को इस बात का कष्ट था कि उनके बाद पितरों को पिंडदान कौन करेगा और वे देव-ऋण तथा पितृ-ऋण से कैसे मुक्त होंगे।
दुख से व्याकुल होकर एक दिन राजा वन की ओर चले गए। दोपहर के समय प्यास से व्याकुल राजा पानी खोजते हुए एक सरोवर के पास पहुँचे। वहाँ मुनियों के आश्रम बने हुए थे। राजा ने आश्रम में उपस्थित मुनियों को प्रणाम किया और उनके आने का कारण पूछा।
मुनियों ने बताया कि वे ‘विश्वदेव’ हैं और उस दिन संतान प्रदान करने वाली श्रावण पुत्रदा एकादशी है। राजा की व्यथा सुनकर मुनियों ने उन्हें इस एकादशी का व्रत रखने का परामर्श दिया।
राजा ने मुनियों की आज्ञा मानकर उसी दिन श्रद्धापूर्वक पुत्रदा एकादशी का व्रत किया और अगले दिन द्वादशी को पारण किया। व्रत के प्रभाव और मुनियों के आशीर्वाद से रानी ने गर्भ धारण किया और समय आने पर एक अत्यंत तेजस्वी, शूरवीर और प्रजापालक पुत्र को जन्म दिया।
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