Tuesday, September 15, 2026
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दस लक्षण पर्व/Dash Lakshana Parva

दस लक्षण पर्व/Dash Lakshana Parva
दस लक्षण पर्व/Dash Lakshana Parva

कभी आपने सोचा है कि धर्म का वास्तविक उद्देश्य क्या है? क्या केवल पूजा-पाठ, व्रत और धार्मिक अनुष्ठान करना ही धर्म है या फिर अपने भीतर के क्रोध, अहंकार, छल और लोभ को दूर करना भी उतना ही जरूरी है? जैन धर्म की मूल भावना मनुष्य को बाहरी आडंबर से अधिक आत्मचिंतन और आत्मशुद्धि की ओर ले जाने की है। दिगंबर जैन परंपरा में इसी आत्मशोधन और संयम की भावना को समर्पित है दशलक्षण पर्व। यह दस दिनों का ऐसा आध्यात्मिक पर्व है, जिसमें प्रत्येक दिन आत्मा के एक विशेष गुण और धर्म पर मनन किया जाता है।

दशलक्षण पर्व को दिगंबर जैन समाज का अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। इस दौरान श्रद्धालु पूजा, स्वाध्याय, ध्यान, तप, व्रत और आत्मचिंतन के माध्यम से अपने जीवन को अधिक संयमित और सात्विक बनाने का प्रयास करते हैं। इन दस दिनों का उद्देश्य केवल धार्मिक क्रियाएं करना नहीं, बल्कि जीवन में उन गुणों को उतारना है जो मनुष्य को आत्मिक उन्नति और मोक्ष के मार्ग की ओर ले जाते हैं।

क्या है दशलक्षण पर्व का अर्थ?

दशलक्षण का अर्थ है—दस धर्म या दस श्रेष्ठ आध्यात्मिक गुण। दिगंबर जैन परंपरा में इन दस दिनों में एक-एक धर्म पर विशेष चिंतन किया जाता है। ये दस धर्म हैं—उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य और उत्तम ब्रह्मचर्य।

इन गुणों का उद्देश्य मनुष्य को अपने भीतर झांकने की प्रेरणा देना है। क्रोध के स्थान पर क्षमा, अहंकार के स्थान पर विनम्रता, छल के स्थान पर सरलता और लोभ के स्थान पर संतोष एवं अपरिग्रह को अपनाना ही इस पर्व की मूल भावना है।

कब मनाया जाता है दशलक्षण पर्व?

दिगंबर परंपरा में दशलक्षण पर्व भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पंचमी से चतुर्दशी तक दस दिनों तक मनाया जाता है। 2026 में उपलब्ध जैन कैलेंडर स्रोतों में इसकी शुरुआत 15 या 16 सितंबर से बताई गई है और स्थानीय पंचांग के अनुसार तिथियों में एक दिन का अंतर हो सकता है। इसलिए स्थानीय जैन मंदिर या समाज द्वारा जारी पंचांग के अनुसार तिथि की पुष्टि करना उचित रहेगा।

यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि दिगंबर परंपरा का दशलक्षण पर्व श्वेतांबर परंपरा के आठ दिवसीय पर्युषण का केवल दस दिवसीय रूप नहीं है। दोनों परंपराओं में पर्व की अपनी अलग धार्मिक संरचना और साधना-पद्धति है।

दस दिनों में दस धर्मों की साधना

दशलक्षण पर्व का प्रत्येक दिन आत्मशुद्धि के एक विशेष गुण को समर्पित होता है।

पहला दिन—उत्तम क्षमा: क्रोध और वैर को त्यागकर क्षमा एवं सहनशीलता को अपनाने का संदेश देता है।

दूसरा दिन—उत्तम मार्दव: अहंकार और मान को छोड़कर विनम्रता का भाव विकसित करने की प्रेरणा मिलती है।

तीसरा दिन—उत्तम आर्जव: मन, वचन और कर्म में सरलता तथा छल-कपट से दूर रहने का अभ्यास किया जाता है।

चौथा दिन—उत्तम शौच: लोभ और असंतोष को छोड़कर मन की पवित्रता और संतोष पर जोर दिया जाता है।

पांचवां दिन—उत्तम सत्य: सत्य बोलने और ऐसा सत्य बोलने की प्रेरणा दी जाती है जिससे किसी जीव को अनावश्यक कष्ट न पहुंचे।

छठा दिन—उत्तम संयम: इंद्रियों, इच्छाओं और व्यवहार पर नियंत्रण रखते हुए आत्म-अनुशासन का अभ्यास किया जाता है।

सातवां दिन—उत्तम तप: तप और साधना के माध्यम से शरीर और मन पर नियंत्रण तथा आध्यात्मिक उन्नति का प्रयास किया जाता है।

आठवां दिन—उत्तम त्याग: अपने स्वार्थ और संग्रह की भावना को कम करते हुए त्याग, दान और सेवा की भावना को महत्व दिया जाता है।

नौवां दिन—उत्तम आकिंचन्य: बाहरी वस्तुओं और मोह-माया के प्रति आसक्ति कम करने तथा अपरिग्रह की भावना अपनाने का संदेश मिलता है।

दसवां दिन—उत्तम ब्रह्मचर्य: मन, वचन और कर्म की पवित्रता तथा आत्मा के प्रति समर्पण पर विशेष जोर दिया जाता है।

दस लक्षण पर्व/Dash Lakshana Parva

पूजा, उपवास और स्वाध्याय का महत्व

दशलक्षण पर्व के दौरान जैन श्रद्धालु अपनी क्षमता और संकल्प के अनुसार विभिन्न प्रकार की धार्मिक साधनाएं करते हैं। इनमें उपवास, एकासन, स्वाध्याय, ध्यान, सामायिक, प्रतिक्रमण, पूजा और प्रवचन प्रमुख हैं। कई श्रद्धालु दसों दिनों तक विशेष तप और उपवास का संकल्प लेते हैं, जबकि अन्य अपनी क्षमता के अनुसार संयम और साधना का पालन करते हैं।

इस दौरान जैन मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। प्रवचनों के माध्यम से दसों धर्मों के आध्यात्मिक अर्थ को समझाया जाता है। धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन व्यक्ति को यह समझने में मदद करता है कि धर्म केवल पूजा की प्रक्रिया नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक ऐसी पद्धति है जिसमें अहिंसा, संयम और आत्मनियंत्रण को सर्वोच्च स्थान दिया गया है।

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अनंत चतुर्दशी और क्षमावाणी का संदेश

दशलक्षण पर्व का दसवां दिन अनंत चतुर्दशी से जुड़ा होता है और दिगंबर परंपरा में इसका विशेष आध्यात्मिक महत्व है। इसके बाद क्षमावाणी का पर्व मनाया जाता है, जिसमें व्यक्ति अपने मन, वचन और कर्म से किसी को पहुंचाए गए दुख के लिए क्षमा मांगता है और दूसरों को भी क्षमा करता है। इस तरह पर्व की साधना केवल व्यक्तिगत आत्मचिंतन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि रिश्तों में प्रेम, विनम्रता और सौहार्द का संदेश भी देती है।

दशलक्षण पर्व देता है जीवन बदलने का संदेश

दशलक्षण पर्व हमें यह सिखाता है कि सच्चा धर्म मंदिर या धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। धर्म तब सार्थक होता है जब वह हमारे व्यवहार में दिखाई दे। यदि क्रोध के स्थान पर क्षमा, अहंकार के स्थान पर विनम्रता, छल के स्थान पर सरलता, असत्य के स्थान पर सत्य और लोभ के स्थान पर त्याग आ जाए तो यही वास्तविक आत्मशुद्धि है।

दशलक्षण पर्व के दस दिन वास्तव में अपने भीतर झांकने, अपनी कमियों को पहचानने और उन्हें दूर करने का अवसर देते हैं। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि आत्मा की शुद्धि किसी एक दिन की साधना से नहीं, बल्कि निरंतर संयम, तप, त्याग और सद्गुणों को जीवन में उतारने से होती है। यही दशलक्षण पर्व का सबसे बड़ा संदेश है—अपने भीतर बदलाव लाइए, क्योंकि सच्ची साधना वहीं से शुरू होती है।

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– सारिका असाटी

 

 

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