
सावन में कांवड़ यात्रा शुरू होते ही शिवभक्त भारी संख्या में कांवड़ लेकर गंगोत्री, हरिद्वार जैसे पवित्र स्थान पर गंगाजल लेने पहुंच जाते हैं। वहीं, शिवरात्रि के दिन अपने घर के पास वाले मंदिर में शिवजी का जलाभिषेक करते हैं। यह यात्रा शिवभक्त भोलेनाथ की कृपा पाने और उन्हें प्रसन्न करने के लिए करते हैं। ऐसे में आइए जानें की इस बार कांवड़ यात्रा कब से कब तक चलेगी और इसका महत्व।
सावन माह में शुरू होने वाली का हिंदू धर्म में बहुत खास महत्व है। इस दौरान शिवभक्त केसरिया रंग के वस्त्र पहनकर भारी संख्या में गंगाजल लेने निकल जाते हैं। वहीं, सावन शिवरात्रि के दिन वापस आकर शिवलिंग पर जल अर्पित करें और इसी के साथ ही कांवड़ यात्रा समाप्त हो जाती है। कांवड़िये इस दौरान गंगोत्री, हरिद्वार आदि पवित्र स्थानों से कांवड़ में गंगाजल भरकर अपने घर के पास वाले शिवमंदिर में शिवजी का जलाभिषेक करते हैं। इस यात्रा को बहुत ही शुभ फलदायी माना जाता है और भक्तों के लिए कांवड़ यात्रा बहुत ही खास और महत्वपूर्ण है।
कांवड़ यात्रा 2026 कब से कब तक?
सावन का महीना शुरू होते ही कांवड़ यात्रा भी आरंभ हो जाती है। चूंकि इस बार सावन की शुरुआत 30 जुलाई, गुरुवार से हो रही है। ऐसे में इसी दिन से कांवड़ यात्रा भी शुरू होगी। हालांकि, मकर संक्रांति के अनुसार कई स्थानों पर कांवड़ यात्रा शुरू हो चुकी है। वहीं, इस यात्रा का समापन सावन शिवरात्रि पर होता है, जो 11 अगस्त, मंगलवार को पड़ रही है। ऐसे में मुख्य रूप से कांवड़ यात्रा 30 जुलाई से लेकर 11 अगस्त तक चलेगी। कई स्थानों पर पूरे सावन भी कांवड़ यात्रा चलती है।
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कांवड़ यात्रा क्यों निकाली जाती है
कांवड़ यात्रा भगवान शिव की भक्ति से जुड़ी सबसे बड़ी धार्मिक यात्राओं में गिनी जाती है। मान्यता है कि गंगा का पवित्र जल लाकर शिवलिंग पर चढ़ाने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं। कोई सुख-समृद्धि की कामना से कांवड़ उठाता है तो कोई परिवार की खुशहाली, अच्छी सेहत या किसी विशेष मनोकामना के लिए यह यात्रा करता है। यात्रा के दौरान श्रद्धालु पूरी तरह सात्विक जीवन अपनाने की कोशिश करते हैं। रास्ते भर शिव भजन, जयकारे और सेवा का माहौल देखने को मिलता है। यही वजह है कि इसे सिर्फ यात्रा नहीं बल्कि आस्था का उत्सव भी कहा जाता है।

कांवड़ यात्रा कितने तरह की होती है
हर कांवड़ यात्रा एक जैसी नहीं होती। श्रद्धालु अपने संकल्प और क्षमता के हिसाब से अलग-अलग तरह की कांवड़ लेकर चलते हैं।
• रेगुलर कांवड़ सबसे सामान्य होती है। इसमें श्रद्धालु पैदल चलते हैं, रास्ते में विश्राम करते हैं और तय समय पर शिव मंदिर पहुंचकर जल चढ़ाते हैं।
• डाक कांवड़ काफी कठिन मानी जाती है। इसमें श्रद्धालु लगातार चलते रहते हैं या रिले की तरह यात्रा पूरी करते हैं। आमतौर पर यह यात्रा सावन शिवरात्रि से एक-दो दिन पहले पूरी की जाती है।
• डंडी कांवड़ सबसे कठिन मानी जाती है। इसमें श्रद्धालु दंडवत करते हुए या शरीर को जमीन पर फैलाकर धीरे-धीरे पूरी दूरी तय करते हैं। इसे तप और भक्ति का सबसे कठिन रूप माना जाता है।
यात्रा पर जाने से पहले इन बातों का रखें ध्यान
अगर पहली बार कांवड़ यात्रा पर जा रहे हैं तो पहले से तैयारी कर लें। जिस रास्ते से यात्रा करनी है उसकी जानकारी रखें। मौसम का हाल जरूर देख लें क्योंकि सावन में बारिश भी होती है। आरामदायक कपड़े पहनें, जरूरी दवाइयां साथ रखें और शरीर में पानी की कमी न होने दें। यात्रा के दौरान प्रशासन के निर्देशों का पालन करें और जहां-जहां शिविर बने हों, वहीं रुकें।
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3 से 11 अगस्त की अवधि रहेगी महत्वपूर्ण
3 अगस्त से लेकर 11 अगस्त तक रास्तों और मंदिर में शिव भक्त बड़ी संख्या में नजर आएंगे। इसकी वजह है की 3 अगस्त को सावन का पहला सोमवार है और 11 अगस्त को सावन शिवरात्रि। ऐसे में इस अवधि के दौरान कांवड़ियों के भीतर एक अलग ही जोश देखने को मिलता है। सभी लोग ‘हर हर महादेव’ और ‘बम बम भोले के जयकारे’ लगाते नजर आते हैं। साथ ही, मंदिरों में भक्तों की संख्या भी बढ़ने लगती है और कांवड़िया अपने घर की ओर बढ़ रहे होते हैं। ऐसे में भक्तों की सुविधाओं के लिए कई रास्तों को बंद कर दिया जाता है। यही कारण है की इन दिनों में भारी जाम का सामना करना पड़ सकता है।

सावन में कांवड़ यात्रा का महत्व
कांवड़ यात्रा बेहद पवित्र तीर्थ यात्रा है जो शिवभक्त भोलेनाथ की कृपा पाने और उन्हें प्रसन्न करने के लिए करते हैं। इस दौरान कोई भक्त नंगे पांव चलता है, कोई पूरी यात्रा पैदल करता है, तो कोई बाइक पर सवार होकर भोलेनाथ के जयकारे लगाते हुए जाता है। मान्यता है की कांवड़ यात्रा में बांस से बने कांवड़ को उठाने और पवित्र जल लाकर शिवलिंग का अभिषेक करने से अत्यंत पुण्य फल की प्राप्ति होती है। यह कांवड़ यात्रा शिवजी के प्रति भक्ति और समर्पण का प्रतीक है। कहा जाता है कि ऐसा करने से शिव भगवान की कृपा अपने भक्तों पर बनी रहती है और साथ ही मोक्ष के द्वार खुलते हैं।
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