Thursday, February 26, 2026
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आनंद की खोज

अंतर में मिलेगा उत्तम आनंद

उत्तम आनंद की खोज में भटकता हुआ इंसान, दरवाजे दरवाजे पर टकराता फिरता है। लेकिन उसे ये आनंद उसके अंतर में ही मिलेगा।

  • उत्तम आनंद की खोज में भटकता हुआ इंसान, दरवाजे दरवाजे पर टकराता फिरता है।
  • लेकिन उसे ये आनंद उसके अंतर में ही मिलेगा।
  • वह चाहता है बहुत-सा रुपया जमा करे, स्वस्थ रहे और सुस्वाद भोजन करें।
  • सुंदर वस्त्र, बढ़िया मकान और गाड़ियों और नौकर-चाकर की चाह हर किसी को होती है।
  • इंसान चाहता है कि पुत्र, पुत्रियों, बंधुओं से घर भरा हो, उच्च अधिकार प्राप्त हों, समाज में प्रतिष्ठा हो, कीर्ति हो।
  • ये चीजें आदमी प्राप्त करता है, जिन्हें ये चीजें उपलब्ध नहीं होतीं, वे प्राप्त करने की कोशिश करते हैं।
  • जिनके पास हैं, वे उससे अधिक लेने का प्रयत्न करते हैं 1
  • इन सब तस्वीरों में आनंद की खोज करते-करते चिरकाल बीत गया, पर राजहंस को ओस ही मिली।
  • मोती की तो खोज ही नहीं की, मानसरोवर की ओर तो मुँह ही नहीं किया।
  • लंबी उड़ान भरने की तो हिम्मत ही नहीं बाँधी।
  • मन ने कहा- जरा इसे और देख लूँ।
  • आँखों से न दिख पड़ने वाले मानसरोवर में मोती मिल ही जाएँगे, इसकी क्या गारंटी है।

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  • यही पहिया चलता रहता है।
  •  आपने खूब खोजा, कुछ क्षण पाया भी, परंतु वे ओस की बूँदें ठहरीं।
  •  वे दूसरे ही क्षण जमीन पर गिर पड़ीं और धूल में समा गईं।
  • यही नष्ट होने की आशंका अधिक संचय के लिए प्रेरित करती रहती है।
  •  इन नाशवान चीजों का नाश होता ही है।
  • इसलिए नाशवान नहीं चिरकाल तक चलने वाले आनंद को ढूंढें।
  • इसे बाहर नहीं अपने अंतर में ढूँढें।
  • अपने अंतर में ही मिलेगा उत्तम आनंद। (संदर्भ – अखंड ज्योति)

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