Monday, March 23, 2026
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मकर संक्रांति का पौराणिक महत्व/Mythology of Makar Sankranti

मकर संक्रांति का पौराणिक महत्व/Mythology of Makar Sankranti
मकर संक्रांति का पौराणिक महत्व/Mythology of Makar Sankranti

सनातन संस्कृति का एक अत्यंत पावन और शुभ पर्व है, जो प्रकृति, सूर्य उपासना और मानव जीवन के बीच संतुलन को प्रदर्शित करता है। यह त्यौहार भारत के विभिन्न प्रदेशों में भिन्न-भिन्न नामों से मनाया जाता है। उत्तर भारत में इसे मकर संक्रांति, गुजरात और महाराष्ट्र में उत्तरायण, तमिलनाडु में पोंगल तथा असम में माघ बिहू के नाम से जाना जाता है। नाम चाहे अलग हों, लेकिन इस पर्व का मूल भाव एक ही है, और वह है; सूर्य देव की उपासना और दान-पुण्य करना।

मकर संक्रांति का पर्व सूर्य देव के मकर राशि में प्रवेश के साथ ही मनाया जाता है। यह वह क्षण होता है, जब सूर्य उत्तरायण शुभ काल आरंभ होता है। धार्मिक दृष्टि से यह समय आत्मशुद्धि और पुण्य अर्जन के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है।

मकर संक्रांति 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त

वर्ष 2026 में मकर संक्रांति का पर्व 14 जनवरी को मनाया जाएगा। इस दिन का पुण्य काल दोपहर 03:13 बजे से आरंभ होगा। वहीं महा पुण्य काल दोपहर 03:13 बजे से शाम 04:58 बजे तक रहेगा। शास्त्रों के अनुसार, इस अवधि में किया गया स्नान-दान और पूजा कई गुना पुण्य फल प्रदान करती है। माना जाता है कि इस शुभ काल में दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और साधक के जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है।

मकर संक्रांति का धार्मिक महत्व

मकर संक्रांति का धार्मिक महत्व अत्यंत गहन है। यह पर्व उत्तरायण की शुरुआत का प्रतीक है, जब सूर्य देव दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर अग्रसर होते हैं। उत्तरायण को आध्यात्मिक उन्नति का काल माना गया है। इस समय किए गए जप, तप, दान और पूजा का फल शीघ्र प्राप्त होता है।

शास्त्रों में उल्लेख है कि मकर संक्रांति के दिन गंगा, यमुना, सरस्वती अथवा किसी भी पवित्र जल स्रोत में स्नान करने से मनुष्य के समस्त पापों का क्षय होता है। साथ ही ब्राह्मणों, साधुओं और दीन-दुःखी, निर्धन, जरूरतमंद लोगों को दान देने से भगवान सूर्य की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

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मकर संक्रांति का पौराणिक महत्व/Mythology of Makar Sankranti

मकर संक्रांति का पौराणिक महत्व

मकर संक्रांति का उल्लेख अनेक पौराणिक कथाओं में मिलता है। महाभारत के अनुसार, भीष्म पितामह ने उत्तरायण काल की प्रतीक्षा करते हुए अपने प्राण त्यागे थे। मान्यता है कि उत्तरायण में देह त्याग करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी कारण इस काल को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।

कृषि प्रधान भारत में मकर संक्रांति का विशेष सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व भी है। यह पर्व नई फसल के स्वागत का प्रतीक है। किसान इस दिन प्रकृति और सूर्य देव का आभार व्यक्त करते हैं। सूर्य देव को जीवन, ऊर्जा, सत्य और तप का प्रतीक माना गया है, इसलिए इस दिन उनकी विशेष आराधना की जाती है। स्नान के पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा के लिए तांबे का लोटा लें और उसमें स्वच्छ जल भरें। जल में पुष्प, तिल, गुड़ और रोली मिलाएं। पूर्व दिशा की ओर मुख करके सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करें। अर्घ्य देते समय श्रद्धा पूर्वक “ॐ सूर्याय नमः” मंत्र का जाप करें। इसके पश्चात सूर्य देव को तिल के लड्डू, खिचड़ी और व्यंजन अर्पित करें। सूर्य चालीसा या आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें। अंत में भगवान सूर्य को प्रणाम कर परिवार की सुख-समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और मंगलमय जीवन की कामना करें।

मकर संक्रांति का पौराणिक महत्व/Mythology of Makar Sankranti

मकर संक्रांति पर दान का विशेष महत्व

मकर संक्रांति का पर्व दान-पुण्य के बिना अधूरा माना जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन किया गया दान अक्षय फल प्रदान करता है, जिसका पुण्य कभी समाप्त नहीं होता। इस दिन दीन-दुःखी, असहाय और जरूरतमंदों की सेवा करने से भगवान सूर्य अत्यंत प्रसन्न होते हैं।

अन्न और भोजन का दान : इस दिन अन्नदान का विशेष महत्व है। खिचड़ी का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसके साथ ही तिल और गुड़ का दान करने से धन, यश और मान-सम्मान में वृद्धि होती है।

वस्त्र दान : मकर संक्रांति के अवसर पर वस्त्र दान का भी विशेष महत्व है। गरीबों, वृद्धों और जरूरतमंदों को नए वस्त्र,  करना पुण्यकारी माना जाता है। ऐसा करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सुख-शांति का मार्ग प्रशस्त होता है।

पोंगल का त्यौहार दक्षिण भारत के राज्यों में मनाया जाने वाला एक बेहद लोकप्रिय हिन्दू त्यौहार है। जबकि यह उत्तर भारत में मकर संक्रांति के रूप में भी मनाया जाता है। इस प्रकार यह दक्षिण भारत के राज्यों में काफी धूमधाम से मनाया जाता है।

कुछ स्रोतों के अनुसार कहा जाता है कि तमिलनाडु में नए वर्ष की शुरुआत भी पोंगल पर्व से ही मानते है। इस त्यौहार का इतिहास ज्यादा पुराना तो नहीं लेकिन लगभग एकाद हजार साल पुराना है। यह पावन त्यौहार दक्षिण भारतीय राज्यों के अलावा  निकटवर्ती देश श्रीलंका, कनाडा और अमेरिका सही कई अन्य देशों में भी धूमधाम से मनाया जाता है। लेकिन यह मुख्य रूप से तमिल लोगों का ही त्यौहार है।

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मकर संक्रांति का पौराणिक महत्व/Mythology of Makar Sankranti

क्या है पोंगल पर्व का भारतवर्ष में महत्व

सौर पंचांग के अनुसार यह त्यौहार तमिल महीनों की पहली तारीख अर्थात 14 या 15 जनवरी को आता है। जबकि तमिलनाडु राज्य में जनवरी महीने में गन्ने और धान की फसल काफी अच्छे से पक जाती है। इसी कारण प्रकृति की असीम कृपा से किसानों के खेत हरे भरे पुनः दिखने लगते है और अच्छी फसल होती है जिसके कारण सूर्य भगवान, इंद्र और गाय एवं बैल की लोग पूजा करते है। वहीं पोंगल का त्यौहार दक्षिण भारत में 3 से 4 तक मनाया जाता है।

पोंगल के त्यौहार पर होते है ये आयोजन

पोंगल का पहला दिन

जानकारी के लिए आपको बता दें कि पोंगल के पहले दिन देवराज इंद्र की बड़ी श्रद्धा से पूजा अर्चना की जाती है। इसमें औरतों होली जलाकर चारों तरफ नृत्य दिखाती है।

दूसरा दिन 

जबकि दूसरा दिन सूर्य पोंगल पर्व के रूप में मनाया जाता है। इस दूसरे वहाँ के लोग विशेष किश्म की खीर बनाते है।

तीसरे दिन जानवरों की पूजा

पोंगल के इस खास पर्व पर लोग तीसरे कृषि पशुओं जिसमें गायों, बैलों की पूजा करते है

चौथा और अंतिम दिन

पोंगल पर्व का अंतिम दिन कन्या पोंगल के रूप में मनाया जाता है। हालांकि इस दिन को तिरुवल्लूर के नाम से भी काफी हद तक जाना जाता है।

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– सारिका असाटी

 

 

 

 

 

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