
आज के आधुनिक युग में लड़का-लड़की स्वयं भी अपने होने वाले जीवनसाथी के बारे में शादी से पूर्व ही सब कुछ जान लेना चाहते हैं। वे जानते हैं कि यह जीवनभर का साथ है। कहीं बाद में पछताना न पड़े, इसलिए वे माता-पिता को अपनी पसंद-नापसंद खुलकर बता देते हैं ताकि उन्हें उनके अनुरूप जीवनसाथी का चुनाव करते वक्त कोई परेशानी न हो।
आज के अभिभावकों को अपने बच्चों की शादी तय करते वक्त यह भली भांति सोच लेना चाहिए कि यह उनकी पूरी जिदंगी का सवाल है। कहीं उनका एक फैसला उनके बच्चे का जीवन तबाह करने में सहायक सिद्ध तो नहीं होगा और बाद में आपको पछताना तो नहीं पड़ेगा। अभिभावकों को चाहिए कि वे अपने बच्चों की शादी तय करते वक्त कुछ बातों पर गौर करें।
अपने बच्चों पर दबाव न डालें–
- किसी दबाव के अधीन अपने बच्चों का रिश्ता तय करेंगे तो बाद में आपको पश्चाताप के आंसू बहाने पड़ सकते हैं। यह बच्चों की जि़ंदगी का मामला होता है। अक्सर देखा जाता है कि माता पिता मन ही मन किसी लड़के/लड़की को अपनी बहू/दामाद के रूप में पसंद करने लगते हैं और अपने दिमाग में यह बात बिठा लेते हैं कि वह उनके बेटे/बेटी के लिए परफैक्ट चुनाव होगा।
जब उनका बेटा/बेटी इस रिश्ते को झुठला देते हैं तो फिर माता-पिता उन्हें अपनी इज्जत की दुहाई देते हुए इस एकतरफा फैसले को उस पर थोपने का प्रयास करते हैं व उस पर शादी का दबाव डालते हैं और अगर वह तब भी नहीं मानते तो उन्हें आत्महत्या की धमकी दे डालते हैं। - हम रोज़ाना इस तरह के किस्से टी. वी. धारावाहिकों में देखते हैं। इसका अंजाम यह होता है कि उनके युवा बच्चे उनके दबाव में आकर शादी कर लेते हैं और यदि शादी के बाद जीवनसाथी उनकी पसंद पर खरा उतरे तो ठीक परंतु यदि ऐसा न हो तो वे जीवनभर इस शादी को एक बोझ समझकर ही निभाते हैं।
- फिर उनके अभिभावक सदैव अपने गलत निर्णय पर स्वयं को कोसते रहते हैं।
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बच्चों की पसंद व खुशी को महत्त्व दें–
मां-बाप को चाहिए कि वे अपने बच्चे का रिश्ता तय करते वक्त उनकी पसंद-नापसंद अवश्य पूछें व यदि उनका चुनाव बच्चों को पसंद न हो तो इसे लेकर तूफान खड़ा न करें।
उसे इस बात की दुहाई न दें कि आपने उसे पालपोस कर बड़ा किया है अतः उसका आपके प्रति भी कोई फर्ज है। ऐसा करके आप अपना अधिकार तो पा लेंगे परंतु आपका बहू-बेटा/ बेटी-दामाद कभी खुश नहीं रह पाएंगे इसलिए ऐसी भूल कदापि न करें।

बराबर का रिश्ता तय करने का प्रयास करें–
- अक्सर कहा जाता है कि शादी-विवाह बराबर वालों में ही होना चाहिए। यह काफी हद तक सही भी है। निर्धन की शादी धनी परिवार में या धनी की निर्धन परिवार में शादी हो जाए तो शादी के बाद काफी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इसी तरह यदि उच्च शिक्षित परिवार का लड़का या लड़की कम पढ़े-लिखे परिवार में आ जाएं तो उनके लिए सहज बने रहना काफी कठिन हो जाता हैं।
- माना कि आज के संदर्भ में कुछ लोगों के लिए ऐसी बातें कोई मायने नहीं रखती परंतु हमारे समाज में अभी भी बराबरी वालों से रिश्ता जोड़ने की परम्परा कायम है और हमें इसे नज़रअंदाज नहीं करना चाहिए।
वैसे तो हर परिवार का माहौल अलग-अलग होता ही है परंतु जहां इतनी भिन्नताएं हों, वहां शादी जैसे रिश्ते को निभाना काफी मुश्किल लगता है। - यदि कम पढ़े-लिखे परिवार की लड़की या लड़का उच्च शिक्षित परिवार की बहू या दामाद बन जाए तो या तो वह स्वयं को हीन समझने लगता है या फिर उसे ससुराल वालों के ताने सुनने पड़ते हैं।
इसी तरह रूपए-पैसे की भिन्नता भी काफी मुश्किल पैदा करती है अतएव जहां तक सभव हो सके, अपने बच्चों का रिश्ता समान वर्ग में ही तय करें। - कहने का तात्पर्य यह नहीं कि यदि बेटा या बेटी किसी अलग वर्ग की लड़की या लड़के को पसंद करते हों तो सिर्फ असमानता के कारण उनकी पसंद को नकार दें। यदि ऐसा हो तो खुशी-खुशी आपको अपने बच्चों की पसंद को अपना लेना चाहिए। हां, ऐसा करते वक्त यह जरूर देख लें कि आपका बेटा/बेटी जीवन भर उसके साथ खुश रह भी पाएंगे या नहीं। ऐसा जानने के लिए अपनी सोच नहीं, बल्कि अपने बच्चों की सोच से यह सब देखने की कोशिश करें।
शादी के बाद बहू/दामाद को किसी तरह की भिन्नता का अहसास न होने दें और यदि वह सहज न हो पाए तो इसमें उसे पूरा सहयोग प्रदान करें। - शादी जीवन भर का पवित्रा बंधन है अतः हर अभिभावक को चाहिए कि वह अपने बच्चों की शादी तय करते व्क्त उनकी पसंद-नापसंद रंगरूप, कामकाज इत्यादि सब बातों को ध्यान में अवश्य रखें ताकि उनके बच्चे अपने शादीशुदा जीवन में खुशी से रह सकें व आपको भी बाद में पछताना न पड़े।
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