Thursday, May 21, 2026
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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस/artifical Intelligence

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस/artifical Intelligence
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस/artifical Intelligence

आजकल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का हर क्षेत्र में इस्तेमाल किया जा रहा है। चिकित्सा से लेकर कानून ही नहीं, कृषि और कारखानों तक, यह तकनीक बेहद उपयोगी और समय बचाने का साधन साबित हो रही है। साथ ही इसका बिना जांचे-परखे उपयोग करना मुसीबत का कारण भी बन रहा है।

ताजा उदाहरण बॉम्बे हाईकोर्ट का है जहां एक वकील ने बिना जांचे एआई से बनी दलीलें दाखिल कीं और इससे नाराज अदालत ने 50,000 रुपए का जुर्माना लगाया। इसी तरह वर्कडे की ताजा ग्लोबल रिपोर्ट बताती है कि सर्वे में शामिल 85 प्रतिशत कर्मचारी मानते हैं कि हर सप्ताह एआई से बचने वाले एक से 7 घंटों में से 40 प्रतिशत समय गलतियां सुधारने में चला जाता है।

इसी तरह अमेरिका और चीन के विश्वविद्यालयों के शोध पत्रों के विश्लेषण से पता चलता है कि एआई ने रिसर्च की गति तो बढ़ाई लेकिन विविधता को नुकसान पहुंचाया है। साफ है कि एआई के फायदे अपार हैं, लेकिन बिना सावधानी के उपयोग से नुकसान भी उतना ही गहरा है। इसलिए संतुलित और सही इस्तेमाल ही इसका सही मार्ग है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस/artifical Intelligence

कृत्रिम बुद्धिमत्ता तेज़ी से जीवन का हिस्सा बन रही

निश्चित ही एआई का उदय 21वीं सदी की सबसे बड़ी तकनीकी क्रांति है। यह डेटा के विशाल समुद्र में डुबकी लगाती है और जरूरी जानकारी निकालती है। इसकी मदद से रिसर्चर तीन गुना अधिक पेपर प्रकाशित कर पा रहे हैं। स्वास्थ्य क्षेत्र में तो एआई डायग्नोसिस की सटीकता बहुत ज्यादा है। एआई तकनीक डॉक्टरों को बीमारियों का जल्द पता लगाने, जांचों का विश्लेषण करने और उपचार सुझाने में मदद करती है। एआई संचालित टेलीमेडिसिन प्लेटफॉर्म ग्रामीण क्षेत्रों के मरीजों को शीर्ष अस्पतालों के विशेषज्ञों से जोड़ते हैं जिससे समय और लागत की बचत होती है। साथ ही देखभाल की गुणवत्ता में सुधार होता है।

किसानों के लिए एआई एक विश्वसनीय साथी साबित हो रही है। यह तकनीक मौसम की भविष्यवाणी कर सकती है, कीटों के हमलों का पता लगा सकती है और सिंचाई व बुवाई के लिए बेहतर समय तक सुझाने लगी है। शिक्षा के क्षेत्र में भी एआई तकनीक उपयोगी है। एआई न्यायिक कार्य, शासन और लोक सेवा प्रदान करने की प्रक्रिया को नया रूप दे रही है।

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कृत्रिम बुद्धिमत्ता तेज़ी से जीवन का हिस्सा बन रही

जाहिर है कि एआई तेजी से अर्थव्यवस्था को बदलने वाली तकनीक बन चुकी है। अनुमान है कि वर्ष 2030 तक यह वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 15.7 ट्रिलियन डॉलर जोड़ सकती है। यह अलग बात है कि इस आर्थिक लाभ का 84 प्रतिशत से अधिक हिस्सा उत्तरी अमेरिका, चीन और यूरोप जैसे विकसित क्षेत्रों को मिलने की संभावना है। भारत जैसे विकासशील देश के लिए भी यह अवसरों का सागर है। यही वजह है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता तेज़ी से जीवन का हिस्सा बन रही है।

इसके साथ ही यह भी समझना होगा कि उत्साह के साथ सतर्कता जरूरी है।
एआई की चमक के पीछे छिपे खतरे नजरअंदाज नहीं किए जा सकते। बॉम्बे हाईकोर्ट का मामला इसका जीता-जागता प्रमाण है।. इसमें उद्धृत एक फैसला कहीं अस्तित्व में था ही नहीं। इसे न्याय प्रक्रिया में बाधा बताया। एआई टूल्स रिसर्च के लिए स्वीकार्य हैं लेकिन सत्यापन करना वकील या पक्षकार की जिम्मेदारी है, वे इससे बच नहीं सकते। यह घटना एआई के हैलुसिनेशन यानी मतिभ्रम जैसे खतरे को उजागर करती है। इस कारण काल्पनिक तथ्य तक गढ़ लिए जाते हैं।

दुनिया में एआई का इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर करना चाहिए

भारत में ही नहीं, दुनिया भर में ऐसे मामले सामने आए हैं। गत वर्ष ऑस्ट्रेलिया में एक वकील ने कोर्ट में कुछ मुकदमों का हवाला देते हुए अपने केस को मजबूत करना चाहा लेकिन जब जज ने इन मुकदमों की लिस्ट जांची तो सामने आया कि ऐसे केस तो कभी हुए ही नहीं। वकील ने बताया कि यह जानकारी एआई से मिली थी। वकील ने कोर्ट से बिना शर्त माफी मांगी। जज ने माफी तो स्वीकार की, लेकिन मामले की जांच भी शुरू कर दी।

वकील का मामला विक्टोरियन लीगल सर्विसेज बोर्ड को भेजा गया। बोर्ड ने उसे निजी लॉ प्रैक्टिस करने से रोक दिया और दो साल तक किसी अनुभवी वकील की निगरानी में काम करने के निर्देश दिए । इस घटना के बाद ऑस्ट्रेलिया के कोर्ट में 20 से ज्यादा ऐसे मामले सामने आए, जहां वकीलों या खुद का कोर्ट में पक्ष रखने वाले लोगों ने एआई का इस्तेमाल करके ऐसे दस्तावेज तैयार किए जिनमें गलत जानकारी थी। जाहिर है वकालत और कानून की दुनिया में एआई का इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर करना चाहिए।

वर्कडे रिपोर्ट में भी एआई के कारण होने वाली फॉल्स सेंस ऑफ प्रोडक्टिविटी’ का भी उल्लेख है। जो समय बचता है, गलतियों सुधारने में उसका 40 प्रतिशत जाया हो जाता है। इसी तरह रिसर्च क्षेत्र में एआई ने गति तो बढ़ाई, लेकिन कीमत भी चुकानी पड़ी। 4.13 करोड़ शोध पत्रों के विश्लेषण से स्पष्ट है कि एआई तकनीक उपयोगी है पर विषय विविधता 4.63 प्रतिशत घटी है।

गोपनीयता उल्लंघन एआई का बड़ा जोखिम है। कैम्ब्रिज एनालिटिका कांड एक बड़ा डेटा गोपनीयता घोटाला था। असल में ब्रिटिश राजनीतिक परामर्श फर्म कैंब्रिज एनालिटिका ने लाखों फेसबुक उपयोगकर्ताओं के निजी डेटा को उनकी सहमति के बिना राजनीतिक अभियानों के लिए अवैध रूप से एकत्र करके उसका उपयोग किया। इसके बाद डेटा सुरक्षा कानूनों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी पर वैश्विक बहस छिड़ी।

फेसबुक पर जुर्माना भी लगा और डेटा सुरक्षा में सुधार के लिए कदम उठाए गए। माना जाता है कि डीपफेक वीडियो ने 2024 के अमेरिकी चुनाव को प्रभावित किया था। साइबर हमलों में भी एआई तकनीक मददगार बन रही है। जाहिर है विश्वसनीयता का संकट बढ़ रहा है।

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नई नौकरियों के लिए अवसर सामने आएंगे

एआई से नौकरियों पर संकट की बात भी बहुत जोरशोर से हो रही है। इस बात से नकारा नहीं जा सकता कि एआई से नौकरीपेशा लोगों पर खतरा है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सभी नौकरियां खत्म हो जाएंगी।

विश्व आर्थिक मंच का अनुमान है कि डेटा एंट्री, कॉल सेंटर, सरल कोडिंग सबसे प्रभावित होंगी लेकिन एआई इंजीनियर, डेटा साइंटिस्ट जैसी नई नौकरियों के लिए अवसर सामने आएंगे। ऐसे में एआई के दौर में अपने आपको प्रासंगिक बनाए रखने के लिए खुद को समय के साथ अपग्रेड रखना जरूरी है।

यह बात सही है कि एआई बहुत सी चीजें कर सकता है, लेकिन वह इंसान की रचनात्मकता, भावनात्मकता और सोचने-समझने की क्षमता का मुकाबला नहीं कर सकता है। एआई तकनीक लीडरशिप जैसी भूमिका नहीं निभा सकती। इसलिए एआई से डरने की बजाय अपनी रचनात्मकता और सोचने-समझने की क्षमता को बढ़ाने पर ध्यान दें।

तमाम खतरों के बावजूद इस तकनीक से किनारा नहीं किया जा सकता। बॉम्बे हाईकोर्ट का निर्देश सभी क्षेत्रों के लिए प्रासंगिक है – एआई सहायक है लेकिन वह इंसान की जगह नहीं ले सकती। इसलिए एआई से बचें नहीं, प्रशिक्षण लें और सरकार नियमन तंत्र मजबूत करे। एआई युग में भी मानव विवेक सर्वोपरि रहेगा।

तकनीक गति दे सकती है, लेकिन इसे दिशा तो इंसान ही देगा। इसलिए एआई तकनीक के उपयोग में जिम्मेदारी का भाव रहना बहुत जरूरी है। एआई मददगार जरूर है लेकिन उस पर पूरी तरह निर्भरता घातक साबित होती है। उससे मिली जानकारी पर आंख मूंदकर भरोसा न करें, उसे जांचें, अपने विवेक का इस्तेमाल करें और फिर आगे बढ़ें।

 

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-सारिका असाटी
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